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भारत के अलावा कई देशों में मना दीपावली का त्यौहार

एडिटर डेस्क/ कई देशों में इस त्योहार पर सरकारी छुट्टी तो होती ही है, इस पर्व की धूमधाम भी देखने लायक होती है। इन देशों में बसे भारतीयों के साथ-साथ वहां के स्थानीय लोग भी इस जश्न में शामिल होते हैं। 

मलेशिया 

मलेशिया में दिवाली को ‘हरि दिवाली’ के तौर पर भी जाना जाता है। मलेशिया के किसी खास हिस्से में नहीं, बल्कि पूरे देश में इसे काफी धूमधाम से मनाया जाता है। पारंपरिक रिवाजों को निभाते हुए इस त्योहार का जश्न शुरू होता है और प्रार्थनाएं की जाती हैं। इस दिन मलेशिया में पब्लिक हॉलीडे होता है। हालांकि, यहां पर आतिशबाजी और पटाखे प्रतिबंधित हैं, लेकिन घरों एवं गलियों को लाइटिंग से काफी खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है।

इंडोनेशिया

इंडोनेशिया में दिवाली मनाने का अंदाज यहां बेहद खास है। इंडोनेशियन आइलैंड बाली पर भारतीय प्रवासी रहते हैं। यहां दिवाली काफी धूमधाम से मनाई जाती है। भारत की तरह ही यहां भी कई दिन पहले से बाजारों की रौनक बढ़ जाती है। पटाखे, मिठाईयों की बिक्री होती है। दोस्तों एवं परिवार में मिठाई और ग्रीटिंग्स के साथ शुभकामनाएं दी जाती हैं। इसके साथ-साथ इस त्योहार से जुड़ी रिवाजों को भी उसी अंदाज में निभाया जाता है जैसे कि भारत में।

नेपाल 

नेपाल में दीपावली को तिहार कहा जाता है। भारत की तरह यहां भी इस मौके पर गणेश-लक्ष्मी जी की पूजा होती है। नेपाल में यह त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है और हर दिन का अपना विशेष महत्व होता है। पहला दिन गाय के लिए समर्पित होता है। उनकी पूजा की जाती है और खाना खिलाया जाता है। दूसरे दिन यहां कुत्तों को समर्पित होता है। उनके लिए खासतौर से स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर खिलाए जाते हैं। तीसरे दिन दीए, लैंप जलाए जाते हैं। इस दिन घर में रोशनी करने का विशेष महत्व होता है। चौथे दिन मृत्यु के भगवान यमराज की पूजा होती है और पांचवे बहन-भाई का त्योहार भाई दूज मनाकर इसे संपन्न किया जाता है।

 

फिजी 

दिवाली के मौके पर भारत की तरह ही फिजी में भी लोगों का उत्साह देखने लायक होता है। इस त्योहार पर लोग नए कपड़े पहनते हैं। एक-दूसरे को उपहार और मिठाइयां देते हैं। भारत की तरह यहां भी लोग घर की साफ-सफाई और सजावट पर खास ध्यान देते हैं। लाइटिंग का भी विशेष महत्व होता है। यहां स्कूल और यूनिवर्सिटीज में भी दीपावली पर तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

 

गयाना

गयाना में दिवाली पर एक दिन का नेशनल हॉलीडे होता है। यहां दिवाली काफी अच्छे तरीके से मनाई जाती है। गयाना में दिवाली मनाने की शुरुआत 1980 के दशक से मानी जाती है। यहां रहने वाले हिंदू समुदाय के लोगों के साथ-साथ स्थानीय लोग भी शरीक होते हैं। मिठाईयों, पकवान और उपहार बांटे जाते हैं।

 

श्रीलंका

श्रीलंका में दीपावली उन त्योहारों में से एक है, जो काफी बड़े स्तर पर और धूमधाम से मनाए जाते हैं। यहां भी इस त्योहार का जश्न लगातार पांच दिनों तक चलता है। धार्मिक रस्मों को निभाने के साथ-साथ यहां रोशनी का भी विशेष महत्व होता है। 

 

थाईलैंड

थाईलैंड में दीपावली को लोई क्रेथोंक कहा जाता है। थाई कैलेंडर के हिसाब से इसे 12वें महीने के पूर्णचंद्र के दिन मनाया जाता है। इस दिन देशभर में यहां आतिशबाजी होती है। गुब्बारे आसमान में छोड़े जाते हैं। केले के पत्ते से बनी खास तरह की लैंप जलाई जाती हैं। इस त्योहार पर यहां का खास आकर्षण होता है बोट परेड। इसके अलावा मनोरंजन के लिए जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है।

 

सिंगापुर

दीपावली पर सिंगापुर में पब्लिक हॉली डे होता है। रंग-बिरंगे फूलों और लाइटिंग से गलियों और घरों को सजाया जात है। घरों में पूजा होने के साथ-साथ सामूहिक प्रार्थनाएं होती हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते हैं। जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। लोगों के मनोरंजन के लिए जगह-जगह मनोरंजन के लिए इंतजाम होते हैं। सेंटोसा द्वीप, क्लार्क क्वे, गार्डन और सिंगापुर जू पर लोग इकट्ठे होते हैं। 

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मेलबर्न है दुनिया का रहने योग्य सबसे शानदार शहर

मेलबर्न/ऑस्ट्रेलिया का मेलबर्न शहर दुनिया में रहने लायक सबसे शानदार शहर है, जबकि कराची और ढाका इस लिहाज से सबसे खराब शहरों में शामिल हैं। द इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट की ग्लोबल लिवेबिलिटी रिपोर्ट में यह बात सामने आयी है। रिपोर्ट के अनुसार, रहने लायक सबसे शानदार शहरों में मेलबर्न के बाद ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना दूसरे स्थान पर तथा कनाडा का वैंकूवर तीसरे स्थान पर रहा है। अन्य शीर्ष शहरों में चौथे से दसवें स्थान पर क्रमश: कैलगरी, एडीलेड, पर्थ, ऑकलैंड, हेल्सिंकी और हैमबर्ग काबिज हैं।

विश्व के 140 शहरों के इस सर्वेक्षण में पहले पांच पायदान के शहर पिछली रिपोर्ट से अपरिवतर्ति हैं। भारत का कोई भी शहर शीर्ष 10 शहरों में जगह पाने में नाकामयाब रहा है। 10 निचले शहरों में भी भारत का कोई शहर नहीं है। सीरिया का दमास्कस रहने के हिसाब से दुनिया का सबसे खराब शहर माना गया है। अन्य खराब शहरों में 139वें स्थान पर लागोस, 138वें स्थान पर त्रिपोली, 137वें स्थान पर ढाका, 136वें स्थान पर पोर्ट मोरेस्बी, 135वें स्थान पर अल्जीयर्स, 134वें स्थान पर कराची, 133वें स्थान पर हरारे, 132वें स्थान पर दोउआला और 131वेंस्थान पर कीव हैं।

औसत वैश्विक जीवन संभाव्यता में भी हालिया वर्षों में गिरावट आयी है। पिछले पांच साल में यह औसत 0.8 फीसदी गिरकर 7.48 फीसदी रह गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच सालों में विश्व भर में अस्थिरता बढ़ी है तथा कई शहरों में उथल—पुथल देखने को मिला है। आतंकवादी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। फ्रांस और ब्रिटेन में लगातार हमले हुए हैं। इन सब कारणों से इन क्षेत्रों के शहरों का स्थान नीचे आया है। इराक, लीबिया, सीरिया और तुर्की सैन्य संघर्षों तथा आम टकराव से जूझ रहे हैं

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जापान की कूटनीति और जापान-चीन सम्बन्ध

टोक्यो/ इस सप्ताह सामयिक वार्ता का केन्द्र बिन्दु है जापान की कूटनीति। आज दूसरी कड़ी में हम होसेइ विश्वविद्यालय के प्रो.मासाहारु हिशिदा से जानेंगे जापान-चीन सम्बन्धों के भविष्य के विषय में।

मेरे विचार में दीर्घावधि के लिहाज से दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सुधारने का यही सबसे अच्छा समय है। कूटनीति में लोग मील का पत्थर साबित होने वाली वर्षगाँठों को महत्त्व देते हैं। सन् 1972 में सामान्य होने के बाद इस साल जापान व चीन के कूटनीतिक सम्बन्धों की 45वीं वर्षगाँठ है। अगले वर्ष 1978 में जापान-चीन शाँति और मैत्री संधि के लागू होने की 40वीं सालगिरह मनाई जाएगी। इसी पटाक्षेप में अप्रैल के महीने में जापान व चीन के विदेश मंत्रियों ने न्यू यॉर्क में बैठक की। दोनों के राष्ट्राध्यक्ष जुलाई माह में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भी जर्मनी के शहर हैमबर्ग में अलग से मिले थे।

किन्तु समस्या यह है कि द्विपक्षीय सम्बन्धों को सुधारने के इन प्रयासों को ले कर अनिश्चितता बनी हुई है। यह कहने की आवश्यकता भी नहीं है कि इसका कारण उत्तर कोरियाई मुद्दा है। तोक्यो और पेईचिंग की प्योंगयांग को लेकर एक सी चिन्ताएँ हैं। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अप्रैल में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भेंट के बाद चीन की ओर अपना सहयोगात्मक व्यवहार भी प्रदर्शित किया जो कि ट्रम्प के चुनावी अभियान के समय के रुख से भिन्न रुख था।

इस नीति परिवर्तन ने जापान में ऐसी चिन्ता को जन्म दिया होगा कि यदि देश चीन के साथ अपने सम्बन्धों को फिर से सही नहीं करता तो अमरीका और चीन बिना जापान को शामिल किए उत्तर कोरिया से निपटना आरम्भ कर सकते हैं। मेरा मानना है कि इसी कारण से जापानी और चीनी सांसदों के बीच राजनय में मई के महीने के आसपास से बढ़ोतरी देखी जा रही है। मुझे लगता है कि उत्तर कोरिया पर साझी चिन्ताओं के कारण जापानी पक्ष चीन के साथ सम्बन्ध सुधार की रणनीति अपना रहा था।

फिर भी ट्रम्प ने ट्विटर पर कहा कि वे चीन से बहुत निराश हुए हैं। इस ट्वीट ने चीन के प्रति उनके सहयोगात्मक व्यवहार में परिवर्तन का संकेत दिया। अमरीका ने दो चीनी कम्पनियों पर प्रतिबन्धों की भी घोषणा की जिनमें से एक व्यापारिक प्रतिष्ठान है और दूसरा बैंक है। वहीं जापान ने भी उत्तर कोरिया पर लगी रोक को कड़ा किया। इससे ऐसा लगा कि जापान और अमरीका मिल कर चीन पर दबाव डाल रहे थे कि वह उत्तर कोरिया पर अपने प्रतिबन्धों को बढ़ाए। जैसा की प्रत्याशित था चीन ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया दी है।

इस शरदकाल में चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी का अधिवेशन होने वाला है लेकिन अब तक उसकी जापान नीति स्पष्ट नहीं है। यदि शी की प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है तो वे जापान के मामले में कहीं अधिक समझदारी दिखाएँगे। इसका अर्थ यह है कि वे लोगों का समर्थन पाने के लिए जापान के प्रति कड़ा रुख कम ही अपनाएँगे। मुझे ऐसा लगता है कि ट्रम्प और शिंज़ो आबे के बीच अच्छे सम्बन्धों को ले कर शी जिनपिंग दबाव में हैं। चीन के लिए जापान के साथ सम्बन्धों में सुधार आँशिक रूप से जापान-अमरीका गठबन्धन को चीन को निशाना बनाने से रोकना है। वसंत ऋतु से जापान और चीन के रिश्तों में सुधार दिखाई दिया तो है किन्तु अभी उनके और अच्छे होने की संभावना नहीं नज़र आती।

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नोट बंदी के बाद रेजगारी से जूझ रहा है देश

आगरा/ देश में नोट बंदी एक ऐतिहासिक फैसला था, इस फैसले के बाद देश की अर्थव्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन देखे गये। एक ओर सरकार के द्वारा इसको अब तक का सबसे बड़ा कदम बताया गया तो सर्मथन व विरोध के बीच में रेजगारी की गुल्लकें घरों में संकट मोचक बनकर सामने आई थीं। समय के साथ स्थितियां प्रतिकूल से अनुकूल होने में समय लगा लेकिन एक बड़ी समस्या ने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, और वो समस्या है बेहद भारी मात्रा में रेजगारी का प्रचलन।

आज स्थिति यह बन चुकी है कि फुटकर दुकानदार और यहां तक की रेहड़ी वाले भी रेजगारी से परहेज करने लगे हैं। रेजगारी में यह समस्या खास तौर पर 10 रूपये के सिक्कों के कारण उत्पन्न मानी जा रही है क्योंकि उसमें नकली और असली सिक्कों का खेल तो काफी पुराना है लेकिन अब स्थिति यह बन चुकी है कि भ्रम की स्थिति और जेब में अनावश्यक बोझ के कारण लोग न तो 5 के और 10 के सिक्के लेना पसंद कर रहे हैं और दुकानदारों का तर्क है कि 10 लाईनों वाले सिक्के ही असली हैं।

भागदौड़ की इस जिंदगी में किसको कितनी फुर्सत है कि सिक्के को लेते वक्त उसकी लाइनों की गिनती करे या असली और नकली की जांच करे ? 

दूसरी ओर बैंकों के द्वारा भी 10 रूपये और 5 रूपये के सिक्कों को लेने में जो नाटक दिखाया जाता है वो रिर्जव बैंक के नियमों को ताक पर रखकर मनमानी मानी जा रही है जिसमें परेशान केवल वो जनता हो रही है जो कि 10 रूपये के 10 सिक्कों को अपनी 100 रूपये की बड़ी पूंजी मानकर अपने दिन को पूरा समझती है और परिवार का पालन करती है।

रिर्जव बैंक कई बार अखबारों और बैंकों को नोटिस के द्वारा आम जनता को संदेश दे चुकी है कि 10 रूपये के चलने वाले सभी सिक्के वैध माने जायें और नासिक स्थित टकसाल में इनको ढाले जाने का कार्य भी निरंतर जारी है लेकिन वर्तमान में बाजारों का हाल यह है कि न तो ग्राहक 10 रूपये के सिक्के लेना पसंद करता है और दुकानदार तो हर सिक्के की असल और नकल को जांचकर ही सिक्के को गल्ले में डालता है।

अभी समस्या के कुछ ही नकारात्मक पहलू सामने आये हैं लेकिन जिस प्रकार से 10 और 5 रूपये के सिक्कों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है उससे लगता है आने वाले दिनों में यह समस्या बड़े-बड़ों को रूला देगी।

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